दो बार विस्थापित चिल्कादांड के संघर्ष की दास्तान


सोमवार, सितम्बर 03, 2012 ·

चिल्कादांड उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के शक्तिनगर थाणे में पड़ने वाले उन 5 गावों का एक सामूहिक नाम है, जिन्हें पहली बार 1960 में रिहंद डैम बनाने के लिए और फिर 1979 में एन टी पी सी के शक्तिनगर परियोजना के कारण विस्थापित होना पडा है. दो बार विस्थापन का दर्द झेल चुके लगभग 30 हज़ार की  यह आबादी 1984 से ही एन सी एल कोयला खनन के  विस्तार के खिलाफ आंदोलनरत है. हाल में, यहाँ मूलभूत सुविधाओं की मांग  को  लेकर आंदोलन फिर से तेज हुआ है. पहले से ही राष्ट्र के विकास के नाम पर 2 बार छले जा चुके लोगों ने  “उत्पीडन प्रतिरोध समिति” के परचम-तले जबरदस्त आन्दोलन की शुरुआत की है. पेश है लोकविद्या आश्रम की एक रिपोर्ट: 

नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और नैशनल थर्मल पावर कारपोरशन के द्वारा पिछले 25 वर्षों से जारी उत्पीडन के खिलाफ स्थानीय जनता ने प्रतिरोध का बिगुल फूंक दिया है. 30 अगस्त 2012 दिन बृहस्पतिवार की शाम चिल्कादांड, निमिया दंड, दियापहरी और रानीबाड़ी के 300 से ज्यादा लोगो ने निमियादांड स्थित बरगद के नीचे 5 बजे से एक सभा की जिसमे एक उत्पीडन प्रतिरोध समिति का गठन किया गया. वर्षों से किसी सांगठनिक पहल के अभाव में स्थानीय जनता में दबा आक्रोश सभा के दौरान थोड़ी थोड़ी देर पर उठने वाले नारों के माध्यम से झलक रहा था और ये नारे इस बात का आभास दिला रहे थे की चिल्कादांड के निवासी सन 85 के उस आन्दोलन की यादें अपने दिलों में संजोय बैठे हैं जब इसी एन टी पी सी से लड़ कर उन्होंने वो जमीन हासिल की थी जिस पर पिछले 25 वर्षो से वे रह रहे हैं और इन २५ वर्षों में एन सी एल और एन टी पी सी के धीरे धीरे होते विस्तार ने लड़ कर छिनी गयी इस जमीन को एक ऐसे क्षेत्र में तब्दील कर दिया है जहां मानव जिन्दगिया तो दूर, कीड़े मकौड़े भी स्वेच्छा से जिन्दा रहना कबूल न करें.

बताते चलें की चिल्कादांड उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के शक्तिनगर थाणे में पड़ने वाले उन 5 गावों का एक सामूहिक नाम है, जिन्हें पहली बार 1960 में रिहंद डैम बनाने के लिए और फिर 1979 में एन टी पी सी के शक्तिनगर परियोजना के कारण विस्थापित होना पडा है. दो बार विस्थापन का दर्द झेल चुके लगभग 30 हज़ार की इस आबादी को 1984 में एक बार फिर से विस्थापित करने की कोशिश की गयी थी जब एन सी एल को कोयला खनन का ठेका दिया गया था. पहले से ही राष्ट्र के विकास के नाम पर 2 बार छले जा चुके लोगों ने तीसरी बार विस्थापन के खिलाप जबरदस्त आन्दोलन किया, और अपनी जगह पर जमे रहे. आज चिल्कादंड एक तरफ एन सी एल की खदान से तो दूसरी ओर शक्तिनगर रेल स्टशन से बुरी तरह घेरा जा चूका है.

चिल्कादांड पुनः संगठित हो रहा है. इस बार मुद्दा विस्थापन का विरोध नहीं, एक बेहतर बसाहट है. दिन रात उडती कोयले की धुल, कोयला ले कर 24 घंटे आते जाते बड़े बड़े डम्फर, ब्लास्टिंग से उड़ कर गिरते बड़े बड़े पत्थर, खान से रोजाना निकलती मिटटी से बनते पहाड़ जिनकी रेडियो धर्मिता स्वयं में एक जांच का विषय है, यह सब मिल कर चिल्कादांड को जोखिम और रोगों की हृदयस्थली बनाते हैं. 30 अगस्त को हुई बैठक का मुख्य एजेंडा एक ऐसा संगठन बनाने का था, जिसके तहत उठने वाली आवाज सभी ग्रामवासियों की हो, न की किसी समूह अथवा समुदाय विशेष की.

नयी और बेहतर जगह पर बसाहट के सवाल को उठाते हुए सर्वप्रथम श्री नर्मदा जी ने कहा की कम्पनी का काम रोके बगैर उसे अपनी बात सुनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. उन्होंने कम्पनी का काम रोकने की रणनीति का जिक्र करते हुए कहा की मुख्य गेट से इनकी आवाजाही जब तक बंद न की जाये, बात नहीं बनेगी. उनकी इस बात से वहाँ बैठे सभी आयु वर्ग के लोग सहमत हुए. स्थानीय श्री रहमत अली ने आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं में कटीबध्हता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा की क्षणिक जोश में आकर कोई निर्णय लेने से लड़ाई का नुकसान होता है. निमियादांड के श्री सूरज जी ने कहा की सरकार पर छोड़ देने से कोई काम पूरा नहीं होता. सरकार एक पत्थर होता है जिसे तराशने का काम जनता को ही करना पड़ता है.

30 हज़ार से भी ज्यादा आबादी के बेहतर बसाहट के मुद्दे को समर्थन देने के लिए लोकविद्या जन आन्दोलन की तरफ से अवधेश, बबलू, एकता और रवि शेखर इस बैठक में उपस्थित थे. अपना वक्तव्य रखते हुए रवि शेखर ने कहा की इन पूंजीपतियों के खिलाफ सन 85 में में शुरू हुई इस लड़ाई की दूसरी पारी को आगे बढाने के लिए चिल्कादांड की नयी पीढ़ी को कुर्बानी देनी पड़ेगी. दुसरे राज्यों में जनता द्वारा सफलतापूर्वक लड़ी गयी लड़ाइयों का उदाहरण पेश करते हुए रवि ने कहा की संघर्ष से जुड़े साथियों को अपना वर्ग और अपने हितैषियों को पहचानना होगा. उन्होंने आगे कहा की लोकविद्या आधारित जीवन यापन करने वाले सभी समाजो की दशा दिशा को समझा जाये तो इन सभी में एकता के अनेको बिंदु तलाशे जा सकते हैं, और लड़ाई को मजबूत बनाया जा सकता है. अवधेश ने नौजवानों से यह अपील की आज के बैठक के उपरान्त वे जरूर स्वेच्छा से एक संगठन बनाएं और इसके मार्फ़त तथा बुजुर्गों की सलाह पर आन्दोलन को मजबूत करें. उन्होंने उपस्थित सभी युवाओं के समक्ष यह प्रस्ताव दिया कि अगर युवा लड़के लड़कियां चाहें तो लोकविद्या आश्रम सबके लिए लोकविद्या विचार के माध्यम से एक नेतृत्व प्रशिक्षण शिविर का आयोजन कर सकता है. इस प्रस्ताव को हाथों हाथ लेते हुए नारों के साथ युवाओं ने अपनी सहमती दी. लोकविद्या आश्रम की तरफ से बोलते हुए एकता ने कहा की चिल्कादांड को बचाने की पिछली लड़ाई में महिलाओं का बड़ा योगदान रहा. उन्हें फिर से बाहर निकलने की आवश्यकता है, अन्यथा आधी आबादी की अनुपस्थिति में किसी भी तरह की सफलता की अपेक्षा करना स्वयं और आन्दोलन के साथ बेईमानी है.

चिल्कादांड के युवाओं के तरफ से बोलते हुए हीरालाल, संतोष, राजेश, विजय, धर्मराज, जयप्रकाश, राहुल कुमार, आशुतोष, जोहर अली आदि ने यह आश्वासन दिया कि इस आन्दोलन में सभी 5 गावों के युवा अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रहने देंगे. अपने वरिष्ठों से उन्होंने यह मांग की कि वे युवाओं का मार्गदर्शन करते रहे, तो बसाहट की इस लड़ाई में जीत चिल्कादांड की होकर रहेगी.

अंत में चिल्कादांड के ग्राम प्रधान जी के आह्वान पर लगभग 20 लडको ने स्वेच्छा से अपने नाम और फोन न. नोट कराया, ताकि आगे तय होने वाली रणनीति में इन्हें शामिल किया जा सके. सभा की अध्यक्षता कर रहे श्री लक्ष्मण गिरी ने लोकविद्या आश्रम कार्यकर्ताओं के द्वारा चिल्कादांड की लड़ाई को संगठित किये जाने की पहल का स्वागत करते हुए आश्रम से इन युवाओं के मार्गदर्शन की अपील की.

अध्यक्ष जी के इस अपील पर श्री अवधेश ने 12 सितम्बर 2012 को उन सभी युवाओं की बैठक लोकविद्या आश्रम पर बुलाई गई है.

Sunday Reading—Jiski zuban Urdu ki tarah


April 15 , 2012, MUMBAI
Paromita Vohra,Mid-Day

As kids we often made fun of our father because he could not read Hindi. He’d grown up in Lahore and moved to Delhi during Partition, when he was twelve. Like many such others, he had learned Urdu, not Hindi, as his second-language. Of course he spoke Hindustani, which mixed Hindi with Urdu. But he leaned towards Urdu and couldn’t read the Devnagri script.


Illustration/ Amit Bandre

Why did we think this was funny? Because we were growing up in a different India, where the ‘national’ language, Hindi, was default and everyone knew it. But of course there are always so many histories, even inside just one home, leave alone a country. So, Urdu was around our house, but as with Hindustani, rather casually and mixed up with many other things. There were books whose mysteries I could not unravel. Hanging out with friends, I’d sometimes hear my dad offer a sheyr as a comment. And a friend, or my mum, would respond with an answering couplet.

It’s not that ours was a house of great erudition — we were really quite a regular middle-class family. It’s just that poetry was a part of life, in a simple way, and in many homes. I only learned the languages taught to me in school — English and Hindi. So what Urdu I knew I learned in this overheard way — or through old Hindi film songs. Perhaps the fact that they were written by accomplished poets like Sahir Ludhianvi, Kaifi Azmi or Shakil Badayuni meant that the mixing of Urdu and Hindi was not just functional, but full of the play and pleasure of poetry. So, for many, these songs reflected our fluid relationship with language, and our everyday, popular relationship with the poetic. They were a place where the worlds of Urdu and Hindi, were not necessarily worlds of Muslim and Hindu, but where they overlapped and meshed.

Learning Urdu is on my To Do Before Too Late list. Because I’d like to graduate from quoting 1950s Hindi film songs to reading Ghalib and Faraz like my father could. However, seeing as I live in Maharashtra, I’m thinking this is one of those things I should just strike off my list, unless I want to be declared anti-national (at best). Because, presenting a “watertight case” to justify a continuing ban on SIMI, one of the affidavits filed by a policeman from Solapur cites Ghalib as an inciter of terrorism. The proof? A sheyr of course: “Mauje khoon ser se guzer hi kyon na jay, Aastane yaar se uth jaein kya!” (“Should we perish in a wave of bloodshed, yet still we will not leave the Beloved’s country”).

It’s not that they found the poem in the backpack of a terrorism accused. They just feel this is the stuff of terrorist propaganda. In another affidavit, an inspector from Ghatkopar police station cites material seized from two SIMI activists. You’d think these might be items for a bomb, or arms or at least a leaflet, right? But no. It’s a children’s magazine called Umang, which is in Urdu.
I don’t even want to suggest sensitisation courses, boss. I’m just wondering how this intelligence gathering method of ignorance and prejudice is supposed to reassure us about security! Sure, there must be terrorists who read poetry. But I doubt it’s poetry that’s causing terrorism. Prejudice of many kinds has curdled our society, separating one language from another, and us from language; but also, separating poetry from life and so, making us stupid. It has robbed us of our ability to understand complexity, ambiguity and so, our ability to live with difference.

Paromita Vohra is an award-winning Mumbai-based filmmaker, writer and curator working with fiction and non-fiction. Reach her at http://www.parodevi.com.

The views expressed in this column are the individual’s and don’t represent those of the paper. 

Comrade Kumbhkarna play review- Sonalee Hardikar


If you like to go to the theatre so that you can take plays home in your head; if you want to go in search of images that will move you, even if you do not immediately ‘understand’ them, and if you are a seeker of restlessness, then Ramu Ramanathan’s COMRADE KUMBHKARNA presented by the National School of Drama (NSD) repertory company is a must see.

From the dark recesses of the stage comes forth a troupe of performers to create and inhabit an imaginary world that is at once ancient yet contemporary, impoverished yet dreamy, profane and vulgar, and yet at the same time immensely poetic and beautiful. Before your eyes the story unravels myths, age old lores that we take as given, staid authority, and its banal memorandums. In a very Marquezesque fashion, the divide between the god and the demon, the Aryan and the Dravidian, the good and the cruel is analyzed and cut to size.

Instead we are given a new lore, a new protagonist- a hero in chains instead of the arch archer. An actor who becomes the character he plays; a hero who is part folk performer, part Kumbhakaran…A Kumbhakaran who is part demon, part god. By mussing up the divide between the real and the unreal, between the personal and the political, between the historical and the contemporary, we are taken on a wild journey. It’s also a precarious one as most journeys that take you away from the known are. It’s also a bold play for its current political resonances. There is intensity to it due to the eloquent hyper real imagery that director Mohit Takalkar and his team have evolved to tell the story.

Though the original text by Ramu Ramanathan is in English, the Hindi version by Santwana Nigam is equally remarkable for the nuances it generates while fitting the original to a Hindi speaking, Hindi singing, and Hindi dancing culture of the play’s world. Music by theater veteran Kajal Ghosh is alluring as it takes off from the age old rhythms of the folk and becomes one of the most accessible and entertaining elements of the production.

COMMORADE KUMBHKARNAA special mention needs to be made about the light design by Pradeep Vaiddya. While working at a repertory, that too of a national stature, one often tends to be compelled to make a statement with the kind of facilities available and to dazzle the audience with the power of technology. Pradeep successfully shirks these temptations. The lighting is novel. It is extremely economical and yet very interesting and effective. So was the initial idea for the costumes of the play, but the execution lacks conviction. It would have been interesting to see more grime, dirt, real wear and tear, and crumpling of the costumes and the effect it would have on the overall narrative, akin to the effect that the crumpled tape spools or the red trunk and the mirrors have.

While casting actors without knowledge of fluent English, the director needs to explore other devices that would fit well with the varying power structures that the characters represent. Actors playing the characters of Tripathi and Singh are otherwise quite capable actors but come out as limited in their rendering because of their self consciousness in speaking the English text. The younger Kumbhakaran played by Ajit Singh Pahlavat brings a lot of energy and vulnerability to the role. Though the older Kumbhakaran succeeds at the poetic moments in the play, the angst that can spark revolutions, the simmering and smoldering of the protagonist, is missing from the body language, and makes for a lukewarm portrayal of the central role.

The twin sister played by Rakhi Kumari is memorable and some of the images she creates are stunning. A special mention is required for the role of Amma played by Sajida. Her stage presence, the texture of her voice all lend favorably to the portrayal. The irreverence and the grit of Amma’s character is played out with a studied amount of detailing by Sajida and it’s a pleasure to watch her throughout the play.
Madame X, although a small role, is played by Ipshita Chakraborty with a commendable poise.

Some questions that I took back with me that may or may not be in direct relation to the play-but concern the broader context of theatre and Indian theatre in general —would the real “Kumbhakarans” (who are mentioned at the end of the play’s brochure and who Ramu dedicates the play to….) be really silent on the key issues that get picked up in the play but are met with silence by the stage Kumbhakaran?

COMMORADE KUMBHKARNAIn current political scenarios of the Indian subcontinent what is and should be the role of theatre— can it be ok for us to just be mirrors and reflect back the complex painful reality?

If one is taking pangas with the powers that be…why take a non committal panga? Why make Kumbhakaran silent on key issues? Is it only possible in the Indian context for a playwright to be writing about Gandhian thought and Maoist thought one after the other, and what are the implications of such writing- if any? Will the repertory take such a play to the real places out of which the characters in the script have developed? If at all any such interaction is generated what shape would the play take then?

Thankfully the life of repertory productions is far greater than most other productions that get mounted elsewhere in the country. And a lot can be done with such a play. It will be quite interesting to watch the journeys that it embarks on, and the effect it produces.

*Sonalee Hardikar is a graduate of the National School of Drama and also the recipient of the Jim Henson fellowship under which she studied scenic design at the University of Maryland. She is a visiting faculty at the National School of Drama and runs a photo studio in Albany, New York.

Original article here

 

Soni Sori’s- Letter to her Lawyer – Feb 23rd ( Audio Hindi and English)


सुप्रीम कोर्ट न्यायलय वकील सर जी के नाम पर खत (२३/०२/२०१२)

वकील सर रायपुर रखने के बजाय हमें दिल्ली में रखना था, रायपुर आने के बाद मेरी परेशानियां बढते ही जा रहा है| मुझे अब तक दवाई की उपलब्ध नहीं किया | दर्द की तकलीफ को व्यक्त करते हुए बताती हूँ तो कहते हैं तुम प्रशासन तौर से आई हो और नक्सली महिला कहकर लिखित देकर मानसिक तनाव दिया जाता है| मुझे दवाई नहीं दिया जा रहा है जिससे मेरा अंदरूनी दर्द बढते जा रहा है| ये सब बाते न्यायालय स्थानीय कोर्ट में भी कहा था न्यायालय भी मेरी समस्या को हल करने के बजाय ये कहकर टाल दिया दिया कि तुम्हारा केस सुप्रीम कोर्ट न्यायालय में चल रहा है| जो कुछ भी करेगा सुप्रीम कोर्ट न्यायालय करेगा| वकील सर हमे पूरा विश्वास है कि सुप्रीम कोर्ट न्यायालय अत्याचार से पीड़ित महिला का न्याय अवश्य करेगा| पर कुछ तकलीफों को स्थनीय कोर्ट न्यायालय भी तो कर सकता है| लेकिन नहीं जान बुझकर सभी लोग हमें परेशान करके रखना चाहते हैं| पहले भी कहा था अब भी कह रही हूँ| मैं सुरक्षित नहीं हूँ ना ही महसूस कर सकती हूँ| मुझपर बहुत ही अन्याय कर रहे हैं| ये लोग हमे जीने नहीं देंगे| ये तो निश्चित है कि एक न एक दिन हमे मरना ही है| थोडा बहुत जीवन बचा है अपने बच्चों के नजदीक रहना चाहती हूँ| ताकि बच्चों से बीच-बीच में मिल सकू ! ये जीवन का क्या भरोसा कब क्या हो जाये इसलिय जगदलपुर वापस करवाइएगा

वकील सर| आप मानो या ना मानो छत्तीसगढ़ सरकार हमे मौत देगी ही! क्योंकि मैं जिस स्थिति से गुजर रही हूँ , मैं ही जानती हूँ| काश हम दिल्ली में रहकर लड़ते तो बिल्कुल सुरक्षित रहते| ये सब आदिवासियों के भाग्य में कहाँ| हम आदिवासियों के नसीब में तो अत्याचार जुल्म सहकर मरना है मरना जरूरी है| हम आदिवासी सरकार के लिये एक ऐसी विजनेस हैं| जितना हम आदिवासियों पर छत्तीसगढ़ सरकार शोषण जुल्म अत्याचार प्रताड़ना महिलाओं पर बलात्कार बेरहमी के साथ नंगा करेगा उतना ही सरकार फायदे में रहेगा| ये सबके लिये ही करोड़ो-अरबों रूपये आते हैं| वकील सर यदि ये सब खत्म होने पर शांति आने पर सरकार में बैठे नेता लोग रोड पर भीख मांगते नजर आयेंगे इसलिये ये सब खत्म करने के बजाय बढ़ावा दे रहे हैं बढा रहे हैं| ऐसी स्थिति में हम जैसे लोगों को कैसे सरकार जिन्दा रख सकती है|

वकील सर मुझपर मेरे अपने आदिवासी भाई-बहन, पिता पर बहुत अधिक अन्याय हो रहा है देख रही हूँ सह रही हूँ| ये सब अत्याचार पर सोचने के लिये ऐसा कदम उठाने के लिये छत्तीसगढ़ सरकार ने हमे मजबूर कर दिया जिससे अब हम भूख हड़ताल कर रहे हैं| जेल में हो या न्यायालय हो या सरकार प्रशासन, हम आदिवासियों की तकलीफों को क्यों नहीं समझता ? वकील सर मेरी इलाज की बात होती है तो इलाज हम दिल्ली में करवाएंगे| क्योंकि पिछले बार जो तकलीफ उठाये हैं वो बार-बार हम नही उठा सकते इससे अच्छा इलाज ना ही हो| पिछले बार इलाज के नाम पर मानसिक तनाव से ग्रस्त किये थे| रायपुर में तडप-तडपकर मरने के लिये ना छोड़ें एक बार आपलोग हमसे मिलने आइयेगा| दीदी और कोई प्लीज सर हम मिलना चाहते हैं| हम इस जगह पर रह नहीं सकते| स्थान्तरण हो|
स्व हस्ताक्षरित
प्रार्थी
श्रीमती सोनी (सोढ़ी)

Audio Soni Sori Letter in Hindi


Letter to Supreme Court Advocate Sir
Advocate sir,
I should have been kept in Delhi instead of Raipur. My troubles have increased ever since I was moved to Raipur. I have not even been provided with medicines. When I express my complaint of pain, they tell me that I have come through the administration, and they call me and write me down as a “Naxalite” woman, and this puts me under a lot of mental stress. I am not given my medicines, due to which my internal pains have been increasing. I have told the local court all this, but instead of solving my problem, the local court is avoiding it by saying that since my case is with the Supreme Court, whatever will be done here will be done by the Supreme Court.
Sir, I have complete faith that the Supreme Court will bring justice to a woman who has suffered torture. However, the local courts also have the ability to resolve some problems. But no! All of these people deliberately want to give me trouble. I am not safe here – I can feel that I am unsafe. I am suffering grave injustice and these people will not let me live. It is certain that I have to die some day or the other. Whatever little life I have left, I want to be close to my children, so that I can meet them from time to time. How can one trust this life – who knows what will happen next? So please get me moved back to Jagdalpur.
Sir, whether you believe it or not, the Chhattisgarh government will definitely award me with death. Only I know what I am undergoing. If only I could have stayed in Delhi while fighting this out, I would have been completely safe. But such is not the fate of adivasis! We, adivasis, are only fated to suffer atrocities and die; dying is necessary. We, adivasis, are a business for the government. The more the Chhattisgarh government will exploit us, oppress us, commit atrocities against us, torture us, rape our women, mercilessly strip us naked, the more the government will profit. It is for this reason alone that tens of billions of rupees come. Sir, if all this ends and there is peace, then the leaders who are now in the government will be seen begging on the streets. This is why, instead of ending this, they are encouraging this, enlarging this. In such a situation, how can the government let our people live?
Advocate sir, there is a lot of injustice happening to me, to my adivasi brother, sister, father… I am seeing this, I am suffering this. The Chhattisgarh government is forcing us to think about all these atrocities, into taking these steps, which is why I am now on a hunger strike. Whether inside the jail, or before the court – why does the government/ administration not listen to the problems of us adivasis? Sir, there is talk of my medical treatment – I want my medical treatment to be conducted in Delhi. The problems I have faced last time – I cannot bear them again and again. Rather, it would be better not to have any treatment at all. Last time, I was put under so much mental tension at the pretext of being given treatment. Please do not leave me to suffer and die in Raipur – please come to meet me once. I want to meet didi or someone else. I cannot stay in this place any longer. Please get me transferred.
Applicant
Smt. Soni Sori

Audio Soni Sori Letter in English

Hindi film songs interpretation in Health Sector


  1. Jiya Jale jaan jale, Raat bhar dhuan chale :FEVER
  2. Tadap tadap ke is dil se aah nikalti rahi : HEART ATTACK
  3. Juda hoke bhi tu mujhme kanhi baaki hai: CONSTIPATION
  4. Bidi jalayile jigar se piya jigar ma badi aag hai: ACIDITY
  5. Tujhme rab dikhta hai yaara main kya karoon : CATARACT
  6. Tujhe yaad na meri aayi kisi se ab kya kahna : ALZHEIMERS
  7. Mann dole mera tann dole : VERTIGO
  8. Tip tip barsa paani, paani ne aag lagayee : Urinary tract infection
  9. Dil Dhadak Dhadak ke keh raha hai,aa bhi ja : HIGH BP
  10. Aaj Kal Paaon Zameen per nahin padte mere:CORN ON FEET
  11. Haay re haay Neend nahin aaye:INSOMNIA
  12. Zindagi Denewale sun, teri duniyase dil bhar gaya, main yahan jite jee mar gaya: “HIGH HOSPITAL BILL”
  13. Aaj kal tere mere pyarke charche har zabanpar, sabko malum hai aur sabko khabar ho gai: “PHARMA driven HEALTH POLICIES AND PRACTICES.”
  14. Dil jalta hai to jalne do—- Heart Burn
  15. Baar Baar DeKho Hazaar baar dekho– MYOPIA
  16. Yeh Dosti hamn nahi choedhengey,chhoadhengey dam magar tera saath na choodhengey- PPP- Public Private Partnership in Health Sector
  17. Yeh Kya jagah hai doston yeh kaun sa gubar hai, habae nigah tak jahaan gubaar hi gubaar hai- Primary Health Centre,  anywhere in India
  18. Jane kahaanmera jigar gaya ji, abhi abhi yahin tha kidhar gaya ji- Illegal  Organ Transplant
  19. Suno, Kaho, Kaha, Suna, Kuch hua kya- abhi to nahi kuch bhi nahi- Hearing Loss
  20. Tum agar muzko na chaho to koi bat nahi, kisi aur ko chahogi to mushkil  hogi- MR to the doctor
  21. Pyar ka vaada ,fifty- fifty, aadha aadha, fifty fifty- Pharma cmpanies and private doctors
  22. Kya hua Tera Wada tera wada, woh kasam woh irada- NATIONAL URBAN HEALTH MISSION
  23. Ye Nayan Dare Dare- Conjuctivitus
  24. Teri Duniya main dil lagta nahi, wapis bula le- Suicidal
  25. Dushman na kare dost ne woh kaam kiya hai, umre bhar ka gham hamain inaam diya hai- Death by medical negligence

More to come watch out…….

वीरता पदक देकर अंकित गर्ग को… कलंकित किया है हर एक मर्द को-


सोनी सोरी की कहानी सुनो   

सोनी सोरी की ज़ुबानी सुनो

पढ़ी है लिखी है पढ़ाती भी है

एक माँ है, पत्नी है, साथी भी है

भारत की नारी है, वासी भी है

अधिकार से आदिवासी भी है

तिरंगे का इतना उसे मान है

लड़कर के लहराया पहचान है

भले ही अभी लोग अनजान हैं

मगर ये भारत की असल शान है

लिंगा कोडोपी की हैं ये बुआ

सुनो के इक दिन कुछ ऐसा हुआ

गाँव में तीन सौ घर जल उठा

हुए बालात्कार और सबकुछ लुटा

हत्यारा पुलिस बल था पता जो चला

लिंगा ने जाकर के सब सच लिखा

सबूतों से लिंगा के रमण सिंह हिला

यहीं से शुरू हुआ नया सिलसिला

पहले तो लिंगा को दोषी कहा

नहीं बस चला तो उसे अगवा किया

प्रताड़ित किया और भूखा रखा

फिर सोनी सोरी पर इलज़ाम गढ़ा

पैसों के लालच से बिक न सकी

तो सोनी भी बलि की बकरी बनी

उठा लाए दिल्ली से सोनी को वो

फिर सुन न सकोगे आगे है जो

अंकित गर्ग नामक एस पी है एक

वहशी दरिंदा है इन्सां के भेस

अकेली नारी को बंदी बना कर

अपने कमीनो की टोली बुला कर

सोनी सोरी को नंगा किया

माता को गाली देता गया

जब बिजली के झटकों से दिल न भरा

तो सोनी की इज्ज़त पर वो टूट पड़ा

पीड़ा से सोनी बेहोश हो गई

अत्याचार इसपर भी न रुक सका

सोनी की कोख में पत्थर भरा

सुबह को सोनी थी आधी मरी

दर्द से कराहती वो चल न सकी

चक्कर जो आया तो फिर गिर पड़ी

शरीर से निर्बल थी, मगर वाह रे वाह

टूटा न मर्दानी का हौसला

उच्चतम न्यायलय में अर्ज़ी लिखी

रमण सिंह की सरकार हिलने लगी

सीबीआई तक बातें पहुँचने लगी

हर एक अत्याचार सबूत बन गए

आईपीएस के अफसर कपूत बन गए

वीरता पदक देकर अंकित गर्ग को

कलंकित किया है हर एक मर्द को

धिक्कार है ऐसी सरकार पर

फिटकार है ऐसी सरकार पर

जिस कोख से जन्मे हैं सब के सब

उस कोख के लाज की बात है

लड़ेंगे, क़सम से हम मर जायेंगे

इन्साफ़ माता को दिलवाएंगे——– by  Rizvi Amir Abbas Syed

जैसे मेरे पास भी एक योनि है…सोनी सोरी


Listen to the poem on Soni Sori here
जज साहब,
मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी है !
सिर्फ बचपन में फोड़े दीपावली के पटाखों की कसम,
आज तक कभी छुआ भी नहीं है बन्दुक को !
हा, घर में मटन-चिकन काटने इस्तेमाल होता,
थोडा सा बड़ा चाकू चलाने का महावरा है मुझे !
लेकिन मैंने कभी तलवार नहीं उठाई है हाथ में !
में तो कब्बडी भी मुश्किल से खेल पानेवाला बंदा हूँ,
मल्ल युद्द्द या फिर कलैरीपट्टू की तो बात कहा ?
प्राचीन या आधुनिक कोई मार्शल आर्ट नहीं आती है मुझे !
में तो शष्त्र और शाष्त्र दोनों के ज्ञान से विमुख हूं !
यह तक की लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी भी पड़ोसी से मांगता हूँ !

लेकिन मेरे पास दो हाथ है जज साहब,
महनत से खुरदुरे बने ये दोनों हाथ मेरे अपने है !
पता नहीं क्यों लेकिन जब से मैंने यह सुना है,
मेरे दोनों हाथो में आ रही है बहुत खुजली !
खुजला खुजला के लाल कर दिए है मेने हाथ अपने !

और मेरे पास दो पैर है जज साहब !
बिना चप्पल के काँटों पे चल जाये और आंच भी न आये
एसे ये दोनों पैर, मेरे अपने है जज साहब !
और जब से मेंने सुना है
की दंतेवाडा कि आदिवासी शिक्षक सोनी सोरी की योनि में
पुलिसियों ने पत्थर भरे थे,
पता नहीं क्यों में बार बार उछाल रहा हु अपने पैर हवा में !
और खींच रहा हूं सर के बाल अपने !
जैसे मेरे पास भी एक योनि है और कुछ पैदा ही रहा हो उस से !

हा, मेरा एक सर भी है जज साहब,
हर १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन,
बड़े गर्व और प्यार दुलार से तिरंगे को झुकनेवाला
यह सर मेरा अपना है जज साहब !
गाँधी के गुजरात से हूं इसलिए
बचपन से ही शांति प्रिय सर है मेरा !
और सच कहू तो में चाहता भी हूं कि वो शांति प्रिय रहे !
लेकिन सिर्फ चाहने से क्या होता है ?

क्या छत्तीसगढ़ का हर आदिवासी,
पैदा होते हर बच्चे को नक्सली बनाना चाहता है ?
नहीं ना ? पर उसके चाहने से क्या होता है ?
में तो यह कहता हु की उसके ना चाहने से भी क्या होता है ?
जैसे की आज में नहीं चाहता हु फिर भी …
मेरा सर पृथ्वी की गति से भी ज्यादा जोर से घूम रहा है !
सर हो रहा है सरफिरा जज साहब,
इससे पहले की सर मेरा फट जाये बारूद बनकर,
इससे पहले की मेरा खुद का सर निगल ले हाथ पैर मेरे ,
इससे पहले की सोनी की योनि से निकले पत्थर लोहा बन जाए,
और ठोक दे लोकतंत्र के पिछवाड़े में कोई ओर कील बड़ी,
आप इस चक्रव्यूह को तोड़ दो जज साहब !
रोक लो आप इसे !
इस बिखरते आदिवासी मोती को पिरो लो अपनी सभ्यता के धागे में !
वेसे मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी !
कभी नहीं छुआ है बन्दुक को ,
नहीं चलाई है तलवार कभी !
और ना ही खुद में पाया है
कोई जुनून सरफरोशी का कभी !
– मेहुल मकवाना, अहमदाबाद, गुजरात
94276 32132 and 84012 93496

 

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