#India – Women in search of work being kidnapped #Vaw


जहाँ काम खोजने आए मजदूर होते हैं अगवा…

सलमान रावी

बीबीसी संवाददाता, भद्राचलम (आंध्र प्रदेश) से

 मंगलवार, 18 जून, 2013 को 07:13 IST तक के समाचार

छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच हो रही हिंसा के कारण बड़ी संख्या में दक्षिण बस्तर के रहने वाले आदिवासी रोज़गार की तलाश में दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों की तरफ रुख कर रहे हैं.

मगर इनके लिए रोज़गार की तलाश भी उतनी आसान नहीं है क्योंकि संगठित गिरोह अब इनका अपहरण कर रहे हैं और इन्हें बंधुआ मजदूर बनने पर मजबूर कर रहे हैं.

 

बस्तर से बसों में बैठकर आन्ध्र प्रदेश जाने वाले इन मजदूरों को भद्राचलम के सरकारी बस स्टैंड से 15 किलोमीटर पहले ही संगठित गिरोहों द्वारा जबरन उतार लिया जाता है.

उसके बाद इनके ना चाहने के बावजूद तमिल नाडु, गोवा, कर्नाटक जैसे राज्यों में इन्हें ईंट भट्ठों, खेतों या फैक्टरियों में काम करने भेज दिया जाता है वो भी औने पौने पारिश्रमिक के साथ.

इस समस्या नें अब इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि आन्ध्र प्रदेश की सरकार नें एक टास्क फ़ोर्स के गठन का निर्णय किया है. भद्राचलम के सब कलक्टर भरत गुप्ता का कहना है कि दल में सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं के अलावा, श्रम विभाग और पुलिस के अधिकारी शामिल होंगे.

मन में डर

सुबह का वक़्त है और आन्ध्र प्रदेश के भद्राचलम के सारपाका बस स्टैंड पर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा से आए कुछ आदिवासी इंतज़ार कर रहे हैं.

ये लोग अपने एजेंट की राह देख रहे हैं. जो उन्हें वादे के मुताबिक मजदूरी दिलवाएगा.

कई सौ किलोमीटर के सफ़र के बाद भी थकान इनके चेहरों पर नज़र नहीं आती.

इनके सफ़र से ज्यादा तकलीफदेह वो ज़िन्दगी है जिसे वो अपने पीछे दंतेवाडा जिले में अपने गाँव में ही छोड़कर आये हैं.

मगर इस जमात में शामिल नौजवान, औरतें और बुज़ुर्ग डरे हुए हैं.

इनमे से कोई कुछ बताना नहीं चाहता.

मुझे बताया गया कि ऐसा इस लिए है क्योंकि ये सब लोग एजेंटों की कड़ी निगरानी में हैं.

‘जबरन कब्ज़े में’

कुछ ऐसा ही भद्राचलम के आंबेडकर चौक के पास का नज़ारा है जहाँ एक दूसरा समूह सुकमा से आई बस से उतर कर इंतज़ार कर रहा है.

मगर भद्राचलम का सरकारी बस स्टैंड आज आम दिनों की तरह नहीं है.

यहाँ वो मजदूर नदारद हैं जोक्लिक करें छत्तीसगढ़ से भद्राचलम होते हुए दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों में भेजे जाते हैं और वो एजेंट भी लापता हैं जो इन्हें जबरन भेजने का काम करते हैं.

आंध्र प्रदेश स्टेट रोडवेज ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के इस बस स्टैंड में तैनात अधिकारी विजय बताते हैं कि इन एजेंटों को हमारे पहुँचने की खबर मिल गई है.

वो कहते हैं, “इन लोगों को पता चल गया है कि बीबीसी के लोग यहाँ आए हैं. इस लिए कोई भी एजेंट नज़र नहीं आ रहा है. हम यहाँ रोज़ इस बस स्टैंड पर तमाशा देखते हैं. छत्तीसगढ़ से आने वाली बसों का एजेंट यहाँ बैठकर इंतज़ार करते हैं. जैसे ही बस आती है ये लोग उनपर टूट पड़ते हैं और आने वाले आदिवासियों को जबरन अपने कब्जे में ले लेते हैं.”

‘मोटा कमीशन’

रोज़ की तरह एजेंट तो ग़ायब हैं मगर मैंने पता लगाते हुए कुछ एक एजेंटों के ठिकाने पर जाकर उनसे मुलाक़ात की तो इस पूरे मामले से पर्दा उठने लगा.

एजेंटों ने नाम नहीं बताने की शर्त पर यह बताया कि छत्तीसगढ़ से आए क्लिक करें मजदूरों का भद्राचलम से अपहरण कर लिया जाता है और फिर उन्हें बंधुआ मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर होना पड़ता है.

भद्राचलम तक बस लेकर आने वाले एक ड्राईवर ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर बताया, “अगर आपको लगता है कि भद्राचलम के बस स्टैंड पर इन्हें उतारा जाता है तो आप ग़लतफ़हमी में हैं. भद्राचलम बस स्टैंड पहुँचने से पंद्रह किलोमीटर पहले ही ये एजेंट और इनके गुर्गों से बसों को जबरन रुकवा लेते हैं और उनमे सवार आदिवासियों को उतार लेते हैं. फिर इन्हें दूसरी गाडी से वहां भेज दिया जाता है जहाँ के लिए इन्हें मोटा कमीशन मिलता है.”

‘डरा धमकाकर’

शहर के एक प्रमुख स्थान पर मौजूद मजदूर सप्लाई करने वाली एजेंसी के संचालक नें बीबीसी से बात करते हुए बताया कि कई महीनों तक मजदूरी करने की बाद कुछ मजदूरों को तो घर लौटने के लिए भीख तक मांगनी पड़ती है.

उनका कहना है कि मजदूरों की मजदूरी भी मालिकों से एजेंट ही ले लेते हैं ये कहते हुए कि जब वो काम कर वापस घर लौटेंगे तो उन्हें पैसे मिल जायेंगे. मगर जब मजदूर वापस लौटते हैं तो इन एजेंटों का कोई अता पता नहीं होता. अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर ये आदिवासी बस संचालकों से फ़रियाद कर किसी तरह अपने गावों वापस लौट पाते हैं.

वहीं ‘सितारा’ नाम के एक जन संगठन से जुड़े डाक्टर शेख हनीफ का कहना है कि मजदूरों को डरा धमका कर उन्हें दूसरी जगहों पर मजदूरी के लिए भेजने वाले लोग संगठित होकर काम कर रहे हैं.

मजदूरों की मंडी

हनीफ का कहना है कि कुछ दिनों पहले उन्होंने कई मामले पकड़े और पुलिस की मदद मांगी.

वो कहते हैं कि उनके संस्था के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने कार्रवाई भी कि. मगर अहिस्ता अहिस्ता ये एजेंट फिर से मज़बूत हो गए क्योंकि ये लोग बहुत संगठित होकर काम करते हैं.

खम्मम जिला प्रशासन को अब लगने लगा है कि एजेंट भद्राचलम को मजदूरों की मंडी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.

क्योंकि यहाँ ओडिशा और छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में आदिवासियों का आना जाना होता है.

मानव तस्करी पर रोक

भद्राचलम के सब कलक्टर डाक्टर भरत गुप्ता नें बीबीसी को बताया कि प्रशासन नें इस तरह की गतिविधि का संज्ञान लिया है और जल्द ही एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया जा रहा है जो इस तरह की मानव तस्करी पर रोक लगाने की दिशा में काम करेगा.

कहीं क्लिक करें माओवादी छापामारों का फरमान तो कहीं सुरक्षा बलों की हलचल से परेशान छत्तीसगढ़ के क्लिक करें आदिवासी ये सोच कर अपने आशियानों को छोड़ कर निकल रहे हैं कि उन्हें एक बेहतर ज़िन्दगी मिलेगी.

लेकिन मानव तस्करों के बड़े संगठित गिरोहों ने उनकी जिंदगियों को और मुश्किल में डाल दिया है.

इनके लिए तो ये ऐसा है कि मानो आसमान से गिरे तो खजूर पर जा अटके.

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Bombay HC- Reimburse unaided schools for expense on SC/ST students #goodnews


Express news service : Mumbai, Thu Apr 04 2013,

 

Bombay High Court (HC) directed the state government Wednesday to reimburse unaided schools for expenses incurred on education of SC/ST students as per RTE Act.

The money — Rs 10, 463 per student per year till standard 7 or the actual amount spent, whichever less — is to be reimbursed irrespective of incomes of parents or guardians of the students from academic year 2010- 2011.

For higher secondary school students, the reimbursment is according to recommendations made by a state-appointed committee in 2010.

For schools in Mumbai, it is Rs 350; for those under other municipal corporations, it is Rs 250 and for the rest of the state, Rs 200.

Schools are also to be reimbursed for OBC, VJNT and SBC students the annual income of whose parents is less than Rs 1 lakh.

HC clarified while RTE Act could not be invoked against the wishes of minority unaided schools, institutions admitting students from disadvantaged sections could claim reimbursement.

A division bench of justices Mohit Shah and N M Jamdar said provisions of RTE Act should be read in the light of articles 21A (right to education) and 46 (promotion of educational and economic interests of weaker sections) of the Constitution.

HC noted though RTE Act applied to elementary education, the state had been giving the benefit of reimbursement to classes 9 and 10 as well.

 

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