प्रेम या हिंसा ?


 

एक घाव एक  चुम्बन

एक  अहसास एक आलिंगन

एक स्मृति  एक चिंतन

एक अनुभूति एक मंथन

प्रेम की अगर यह परिभाषा है

हिंसा की  है इसमें  गंध

वह धीमी सी मुस्कान

तुम्हारे चेहरे पे बता रही है

नयनों  में  एक रुका हुआ  आंसू

आंसुओं  मैं तड़पती हैं आहें

आहों में मचलता है दिल,

दिल में उठता है एक  ज्वालामुखी

जलते हैं उसमें सपने

जलते हैं उसमें अरमान

प्रेम नहीं……..

हिंसा यह जान लो

 

by- कामायनी बाली महाबल 

1 Comment (+add yours?)

  1. Rahul Yogi deveshwar
    Jan 09, 2013 @ 15:43:11

    प्रेम देने मे है , प्रेम मे कुछ पा लेने की इच्छा ,कुछ हासिल कर लेने की इच्छा हो तो उसे प्रेम नही समझना चाहिए, सही कहा गया है आपकी इस कविता के द्वारा … कुछ लाइन्स मैं कहना चाहता हूँ आपकी ही कविता के संधर्ब मे …

    शक्ति है मेरी देह मे ,
    नही तेरे तांडव की दशा,
    मेरे उस रुके आँसू मे ,
    तेरे अरमानो की मंशा है …

    ना तुझपर मर्म ,
    ना मुझपर मुझको,

    बस अंदर कुछ है,
    जो तुझपर ठहाके लगाता है,

    तेरा प्रेम उस आईने मे,
    नंगा बतलाता है …

    तेरा प्रेम प्रेम नही ,
    हिंसा है!
    यह जान लो ..

    Reply

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