#India – Sterilization for Accomplishing Targets -टारगेट पूरा करने के लिए बंध्याकरण! #Vaw #Womenrights


jUNE 13, 2013, Prabhat Khabar

ये है हकीकत..

बंध्याकरण पर दबाव नहीं
बंध्याकरण शिविरों में महिलाएं दबाव में नहीं आतीं. वे अपनी मरजी से आती हैं. देश में कुछ ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां इस तरह के मामले हों, पर सब जगह ऐसा नहीं है.
एसके सिकदर, संचालक, जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमपिछले कुछ समय से महिलाओं के बंध्याकरण से जुड.ी खबरें आती रही हैं. सबसे दुखद पहलू यह है कि गरीब महिलाएं थोडे. पैसे के लिए बंध्याकरण करवाती हैं. यह भी खबर आती है कि डॉक्टर बिना किसी सुविधा के ही ऑपरेशन करते हैं. जंग लगे चिकित्सीय उपकरण से भी ऑपरेशन करने के मामले सामने आये हैं. इससे महिला के इंफेक्शन होने के खतरे बढ. जाते हैं. कई बार महिलाओं की जान भी चली जाती है.भारत में एक साल में 46 लाख महिलाओं का बंध्याकरण

ये है हकीकत..बंध्याकरण पर दबाव नहीं

बंध्याकरण शिविरों में महिलाएं दबाव में नहीं आतीं. वे अपनी मरजी से आती हैं. देश में कुछ ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां इस तरह के मामले हों, पर सब जगह ऐसा नहीं है.

एसके सिकदर, संचालक, जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमबिना किसी सुविधा के ऑपरेशन

यह एक साई है कि डॉक्टर बिना किसी सुविधा के ही ऑपरेशन करते हैं. ऑपरेशन के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले उपकरण पुराने और गंदे होते हैं. कई बार डॉक्टर बिना ऑपरेशन थियेटर के ही सामान्य टेबल पर ऑपरेशन करते हैं.बंध्याकरण के लिए कतार में खड.ी महिलाएं.पिछले कुछ समय से महिलाओं के बंध्याकरण से जुड.ी खबरें आती रही हैं. सबसे दुखद पहलू यह है कि गरीब महिलाएं थोडे. पैसे के लिए बंध्याकरण करवाती हैं. यह भी खबर आती है कि डॉक्टर बिना किसी सुविधा के ही ऑपरेशन करते हैं. जंग लगे चिकित्सीय उपकरण से भी ऑपरेशन करने के मामले सामने आये हैं. इससे महिला के इंफेक्शन होने के खतरे बढ. जाते हैं. कई बार महिलाओं की जान भी चली जाती है.सेंट्रल डेस्क

जब भी भारत में परिवार नियोजन की बात उठती है, तब महिलाएं ही सबसे आगे होती हैं. यह जानना महत्वपूर्ण है कि दुनियाभर में होने वाले महिला बंध्याकरणों में भारत की 37 प्रतिशत महिलाएं होती हैं. पोपुलेशन फाउंडेशन की संयुक्त निदेशक सोना शर्मा के अनुसार, बंध्याकरण मुहिम में महिलाएं ही निशाने पर होती हैं, क्योंकि भारतीय समाज में पुरुषों का आधिपत्य है. पुरुष इस बात से डरते हैं कि वे ऑपरेशन से कमजोर हो जायेंगे या वे अपनी र्मदाना ताकत खो देंगे. बंध्याकरण कराने वाली महिलाओं को सरकार द्वारा दिये जाने वाले पैसे और साथ ही डॉक्टरों को भी इसके लिए अच्छी रकम दिये जाने के कारण महिलाओं के बंध्याकरण में तेजी आयी है. पिछले साल 46 लाख महिलाओं का बंध्याकरण किया गया. इनमें से अधिकांश महिलाओं ने पैसे के लिए बंध्याकरण करवाया. जबकि पिछले साल होने वाले कुल बंध्याकरण में महज चार प्रतिशत ही पुरुष थे. नयी दिल्ली स्थित ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के ‘रिप्रोडक्टिव राइट्स’ की डायरेक्टर केरी मैकब्रूम के अनुसार, इससे समझा जा सकता है कि भारत में महिलाओं की क्या स्थिति है, उन्हें अपने प्रजनन संबंधी अधिकारों पर भी नियंत्रण नहीं है. वह कहती हैं महिलाएं आसानी से बलि का बकरा बनायी जाती हैं, चाहे इसके लिए सरकारी अधिकारी जिम्मेदार हों या फिर उनके पति. संयुक्त राष्ट्र के डाटा के अनुसार, प्रजनन पर नियंत्रण करने के लिए उपाय करने वाले 49 प्रतिशत दंपत्तियों में तीन चौथाई महिलाएं ही बंध्याकरण के लिए आगे आती हैं.

कमाई का जरिया

जब भी परिवार नियोजन के लिए बंध्याकरण शिविर लगाये जाते हैं, वहां महिलाएं कतार में खड.ी रहती हैं. डॉक्टर बस उन्हें एनीमिया टेस्ट के लिए बोलते हैं. इसके बाद डॉक्टर बड.ी तेजी से ऑपरेशन करते हैं. प्रत्येक ऑपरेशन पर केवल तीन मिनट का समय दिया जाता है. डॉक्टर को अपनी कमाई से मतलब रहता है.

पूरा करना होता है टारगेट

नयी दिल्ली स्थित सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस के डायरेक्टर अभिजीत दास कहते हैं भारत में बंध्याकरण शिविरों में आने वाली अधिकांश महिलाएं पैसे की लालच में आती हैं. स्वास्थ्य अधिकारियों को भी अपना टारगेट पूरा करना होता है. दास का मानना है कि भारत में परिवार नियोजन एक कोटा तंत्र बन गया है. यही कारण है कि चीन के बाद भारत में परिवार नियोजन के लिए अपनाये जाने वाले उपाय सबसे खराब हैं. हमें यह जानना चाहिए कि सरकार ने 1996 में ही बंध्याकरण के लिए टारगेट पूरी करने जैसी नीति को छोड. दिया था. पर आज भी अधिकांश राज्यों में पहले वाली ही स्थिति है. वर्ष के पहले कुछ महीनों को तो ‘बंध्याकरण सीजन’ कहा जाता है. यह सब इसलिए कि 31 मार्च को वित्तीय वर्ष समाप्त होने से पहले बंध्याकरण के लिए निर्धारित लक्ष्य को पूरा किया जा सके. स्वास्थ्यकर्मियों पर बंध्याकरण के टारगेट को पूरा करने का दबाव भी रहता है.

‘ब्लूमबर्ग’ में सर्वप्रथम प्रकाशितझारखंड

राज्य में 29 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन के लिए बंध्याकरण करवाती हैं. जबकि ग्रामीण इलाकों में नसबंदी कराने वाले पुरुषों की संख्या 0.4 प्रतिशत और शहरी इलाकों में यह 0.6 प्रतिशत है.बिहार

प्रत्येक वर्ष साढे. छह लाख महिलाओं का बंध्याकरण जबकि नसबंदी कराने वाले पुरुषों की संख्या महज 12 हजार ही है. बिहार में इस साल 13 हजार से अधिक महिला बंध्याकरण शिविर लगाये जायेंगे

Protest by Omkeshwar Dam affected Oustees


ओम्कारेश्वर बांध : घोघलगाँव में प्रभावितों की सभा और आन्दोलन की घोषणा

Posted by संघर्ष संवाद on शुक्रवार, मई 31, 2013

ओम्कारेश्वर परियोजना प्रभावित गांव घोघलगाँव में 30 मई को हजारों प्रभावितों ने रैली निकालकर आमसभा की. सभा में प्रभावितों हाल ही में राज्य सरकार द्वारा ओम्कारेश्वर प्रभावितों के लिए 212 करोड़ के पुनर्वास पैकज को विस्थापितों के संघर्ष की जीत बताते हुए भूमिहीन प्रभावितों को 2.5 लाख रूपये देने का स्वागत किया. प्रभावितों ने सरकार की किसानो को 2 लाख रूपये प्रति एकड़ देने को पुनर्वास नीति का उल्लंघन बताते हुए उसे अस्वीकार कर दिया. सभा में इंदिरा सागर, महेश्वर आदि बांधों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए और सभी ने आगामी 18 जून से भोपाल में हजारों की संख्या में डेरा डालने की घोषणा की.
गत वर्ष के जल सत्याग्रह के लिए प्रसिद्ध ग्राम घोघलगाँव में हजारों प्रभावितों ने गाँव में रैली निकली और सत्याग्रह स्थल पर माँ नर्मदा की अर्चना की. सभी प्रभावितों में जश्न का माहौल था. रैली के बाद सत्याग्रह स्थल पर आमसभा का आयोजन किया गया. सभा को संबोधित करते हुए नर्मदा आन्दोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्री आलोक अग्रवाल ने कहा कि सरकार की घोषणा ओम्कारेश्वर बांध प्रभावितों के 7 साल के संघर्ष की जीत है पर यह पूरी नहीं आंशिक जीत है. भूमिहीनों के बारे में हमारी मांग पूरी तरह स्वीकार कर ली गयी है पर किसानो को पुनर्वास नीति के अनुसार न्यूनतम 5 एकड़ जमीन खरीदने के लिए सरकार ने सहायता नहीं देकर न सिर्फ पुनर्वास नीति बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का भी उल्लंघन किया है. सरकार द्वारा घोषित राशि से किसान किसी भी हालत में जमीन नहीं खरीद सकता है. उन्होंने इस आंशिक जीत के लिए देश- दुनिया से मिले समर्थन और मिडिया द्वारा संवेदना पूर्वक विस्थापितों की आवाज उठाने के लिए धन्यवाद् दिया.
आन्दोलन की प्रमुख कार्यकर्ता सुश्री चित्तरूपा पालित ने कहा सबसे गरीब को सबसे पहले सहायता मिलने से पुरे क्षेत्र में ख़ुशी है. जिस संकल्प और विश्वास से हमने अभी तक अपनी लड़ाई को इस मुकाम तक लाया है उसी के साथ हम अपने जमीन के अधिकार भी लेकर रहेंगे. उन्होंने मांग की कि सरकार भूमिहीनों को बसने के लिए न्यूनतम 6 माह का समय दे.ओम्कारेश्वर बांध प्रभावित श्री मंसाराम ग्राम एखंड, श्री केसरसिंह ग्राम टोकी, सुश्री सकुबाई ग्राम कामनखेड़ा, सुश्री नीलाबाई ग्राम घोघलगाँव ने भूमिहीनों की घोषणा का स्वागत करते हुए किसानो के लिए हुई घोषणा को नकार दिया और घोषणा की कि उनके न्यूनतम 5 एकड़ सिंचित जमीन के अधिकार के लिए वो संघर्ष तेज करेंगे.

इंदिरा सागर परियोजना प्रभावित हरदा जिले के श्री रामविलास राठौर, खंडवा जिले के श्री राजेंद्र पटेल, देवास जिले से श्री ललित आदि ने कहा की इंदिरा सागर बांध के प्रभावितों को भी उनके पुनर्वास के अधिकार न देकर पूरी तरह उजाड़ दिया गया है और आगामी 18 जून से भोपाल में होने वाले “जीवन अधिकार सत्याग्रह में इंदिरा सागर प्रभावित हजारों की संख्या में शामिल होंगे.
महेश्वर परियोजना प्रभावित श्री राधेश्याम भाई और श्री कैलाश पाटीदार ने कहा कि गत 16 साल की लड़ाई के कारण ही महेश्वर बांध प्रभावित उजड़ने से बचे हुए हैं और महेश्वर परियोजनाकर्ता 15% भी पुनर्वास नहीं कर पाया है. उन्होंने घोषणा की कि भोपाल सत्याग्रह में महेश्वर बांध प्रभावित भी हजारों की संख्या में शामिल होंगे.

भोपाल के जीवन अधिकार सत्याग्रह में 18 जून को पूरी ताकत के साथ पहुंचे के संकल्प के साथ सभा का समापन हुआ. भोपाल में ओम्कारेश्वर, इंदिरा सागर, महेश्वर, मान और अपर बेदा बांध के हजारों प्रभावित 18 जून से 22 जून तक 5 दिन का सत्याग्रह व् उपवास करेंगे.

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कॉमरेड शालिनी को भावभीनी श्रद्धांजलि , Tributes paid to Comrade Shalini


उनके अधूरे कार्यों और सपनों को पूरा करने का संकल्‍प लिया

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लखनऊ, 4 अप्रैल। कॉमरेड शालिनी जैसी युवा सांस्कृतिक संगठनकर्ता के अचानक हमारे बीच से चले जाने से जो रिक्तता पैदा हुई है उसे भरना आसान नहीं होगा। उन्होंने एक साथ अनेक मोर्चों पर काम करते हुए लखनऊ ही नहीं पूरे देश में प्रगतिशील और क्रान्तिकारी साहित्य तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार में जो योगदान दिया वह अविस्मरणीय रहेगा।

का. शालिनी की स्मृति में आज यहाँ ‘जनचेतना’ तथा ‘राहुल फ़ाउण्डेशन’ की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि सभा में शहर के बुद्धिजीवियों तथा नागरिकों के साथ ही दिल्ली, पंजाब, मुम्बई, इलाहाबाद, पटना, गोरखपुर सहित विभिन्न स्थानों से आये लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों ने उन्हें बेहद आत्मीयता के साथ याद किया। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही सभा में उन उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया गया जिनके लिए शालिनी अन्तिम समय तक समर्पित रहीं।

शालिनी पिछले तीन  महीनों से पैंक्रियास के कैंसर से जूझ रही थीं और गत 29 मार्च को दिल्ली के धर्मशिला कैंसर अस्पताल में उनका निधन हो गया था। वे केवल 38 वर्ष की थीं।

राहुल फ़ाउण्‍डेशन के सचिव सत्‍यम ने कहा कि का. शालिनी का राजनीतिक-सामाजिक जीवन बीस वर्ष की उम्र में ही शुरू हो चुका था। गोरखपुर, इलाहाबाद और लखनऊ में प्रगतिशील साहित्य के प्रकाशन एवं वितरण के कामों में भागीदारी के साथ ही शालिनी जन अभियानों, आन्दोलनों, धरना-प्रदर्शनों आदि में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती रहीं। जनचेतना पुस्तक केन्द्र के साथ ही वे अन्य साथियों के साथ झोलों में किताबें और पत्रिकाएँ लेकर घर-घर और दफ़्तरों में जाती थीं, लोगों को प्रगतिशील साहित्य के बारे में बताती थीं, नये पाठक तैयार करती थीं। गोरखपुर में युवा महिला कॉमरेडों के एक कम्यून में तीन वर्षों तक रहने के दौरान शालिनी स्‍त्री मोर्चे पर, सांस्कृतिक मोर्चे पर और छात्र मोर्चे पर काम करती रहीं। एक पूरावक़्ती क्रान्तिकारी कार्यकर्ता  के रूप में काम करने का निर्णय वह 1995 में ही ले चुकी थीं।

इलाहाबाद में ‘जनचेतना’ के प्रभारी के रूप में काम करने के दौरान भी अन्य स्‍त्री कार्यकर्ताओं की टीम के साथ वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच और इलाहाबाद शहर में युवाओं तथा नागरिकों के बीच विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक गतिविध्यिों में हिस्सा लेती रहीं। इलाहाबाद के अनेक लेखक और संस्कृतिकर्मी आज भी उन्हें याद करते हैं।

पिछले लगभग एक दशक  से लखनऊ उनकी कर्मस्थली था। लखनऊ स्थित ‘जनचेतना’ के केन्द्रीय कार्यालय और पुस्तक प्रतिष्ठान का काम सँभालने के साथ ही वह ‘परिकल्पना,’ ‘राहुल फ़ाउण्डेशन’ और ‘अनुराग ट्रस्ट’ के प्रकाशन सम्बन्धी कामों में भी हाथ बँटाती रहीं। ‘अनुराग ट्रस्ट’ के मुख्यालय की गतिविधियों, पुस्तकालय, वाचनालय, बाल कार्यशालाएँ आदि की ज़िम्मेदारी उठाने के साथ ही कॉ. शालिनी ने ट्रस्ट की वयोवृद्ध मुख्य न्यासी दिवंगत कॉ. कमला पाण्डेय की जिस लगन और लगाव के साथ सेवा और देखभाल की, वह कोई सच्चा सेवाभावी कम्युनिस्ट ही कर सकता था। 2011 में ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ का केन्द्रीय पुस्तकालय लखनऊ में तैयार करने का जब निर्णय लिया गया तो उसकी व्यवस्था की भी मुख्य जिम्मेदारी शालिनी ने ही उठायी। वह ‘जनचेतना’ पुस्तक प्रतिष्ठान की सोसायटी की अध्यक्ष, ‘अनुराग ट्रस्ट’ के न्यासी मण्डल की सदस्य, ‘राहुल फ़ाउण्डेशन’ की कार्यकारिणी सदस्य और परिकल्पना प्रकाशन की निदेशक थीं। ग़ौरतलब है कि इतनी सारी विभागीय ज़िम्मेदारियों के साथ ही शालिनी आम राजनीतिक प्रचार और आन्दोलनात्मक सरगर्मियों में भी यथासम्भव हिस्सा लेती रहती थीं। बीच-बीच में वह लखनऊ की ग़रीब बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने भी जाती थीं। लखनऊ के हज़रतगंज में रोज़ शाम को लगने वाले जनचेतना के स्‍टॉल पर पिछले कई वर्षों से सबसे ज़्यादा शालिनी ही खड़ी होती थीं।

कवयित्री कात्यायनी ने उन्हें बेहद हार्दिकता से याद करते हुए कहा कि हर पल मौत से जूझते हुए शालिनी हमें सिखा गयी कि असली इंसान की तरह जीना क्या होता है। आख़िरी दिनों तक शालिनी अपनी ज़िम्मेदारियों और राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों के बारे में ही सोचती रहती थीं। अक्सर फोन पर वे साथियों को कुछ न कुछ जानकारी या सलाह दिया करती थीं। शुरू से ही उन्हें अपने से कई गुना ज़्यादा दूसरों का ख़्याल रहता था। उन्हें मालूम था कि मौत दहलीज़ के पार खड़ी है मगर मौत का भय या निराशा उन्हें छू तक नहीं गयी थी। स्वस्थ होकर ज़िम्मेदारियों के मोर्चे पर वापस लौटने में उनका विश्वास और इसे लेकर उनका उत्साह हममें भी आशा का संचार करता था।

कॉ. शालिनी एक कर्मठ, युवा कम्युनिस्ट संगठनकर्ता थीं। आज के दौर में बहुत से लोगों की आस्‍थाएं खंडित हो रही हैं, लोग तरह-तरह के समझौते कर रहे हैं, बुर्जुआ संस्‍कृति का हमला युवा कार्यकर्ताओं के एक अच्‍छे-खासे हिस्‍से को कमज़ोर कर रहा है, मगर शालिनी इन सबसे रत्तीभर भी प्रभावित हुए बिना अपनी राह चलती रहीं। एक बार जीवन लक्ष्य तय करने के बाद पीछे मुड़कर उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया। उसूलों की ख़ातिर पारिवारिक और सम्‍पत्ति-सम्‍बन्‍धों से  पूर्ण विच्छेद कर लेने में भी शालिनी ने देरी नहीं की। एक सूदख़ोर व्यापारी और भूस्वामी परिवार की पृष्ठभूमि से आकर, शालिनी ने जिस दृढ़ता के साथ पुराने मूल्‍यों को छोड़ा और जिस निष्कपटता के साथ कम्युनिस्ट जीवन-मूल्यों को अपनाया, वह आज जैसे समय में दुर्लभ है और अनुकरणीय भी।

अनुराग ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष और चित्रकार रामबाबू, आह्वान के सम्‍पादक अभिनव सिन्‍हा, आख़ि‍री दिनों में शालिनी के साथ रहीं उनकी दोस्‍त और कॉमरेड कविता और शाकम्‍भरी, जनचेतना की गीतिका, लेखिका सुशीला पुरी, नम्रता सचान, आरडीएसओ के ए.एम. रिज़वी आदि ने शालिनी के व्‍यक्तित्‍व के अलग-अलग पहलुओं को याद किया।

भारतीय महिला फेडरेशन  की आशा मिश्रा ने कहा कि शालिनी जिन मूल्यों और जिस विचारधारा के लिए लड़ती रहीं, आखिरी सांस तक उस पर डटी रहीं। छोटी उम्र में जितनी वैचारिक समझदारी, कामों के प्रति गहरी निष्ठा शालिनी में दिखती थी, इसके उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों  से बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एक्टिविस्टों द्वारा भेजे गये कुछ चुनिन्‍दा शोक-संदेशों को उनके आग्रह पर उनकी ओर से पढ़ा गया। एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सांस्‍कृतिक प्रभाग के प्रमुख निनु चपागाईं ने कहा कि उनकी पार्टी के सांस्कृतिक कार्यकर्ता जनचेतना, अनुराग ट्रस्ट और राहुल फ़ाउण्डेशन के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं ताकि वे कामरेड शालिनी के अनेक दायित्वों को पूरा कर सकें। उन असंख्य लोगों के ज़रिए जिनके लिए उन्होंने क्रान्तिकारी साहित्य उपलब्ध तथा कराया तथा सांस्कृतिक संघर्ष के अनेक मोर्चों पर उनके कार्यों से आने वाले अनेक वर्षों तक परिणाम मिलते रहेंगे। ‘पहल’ के सम्‍पादक ज्ञानरंजन ने कहा कि हमारे सारे वैचारिक मोर्चों पर काम करते हुए शालिनी ने जो बलिदान दिया वो अपने आप में एक मिसाल है। इतने कठिन समय में ऐसा कोई और उदाहरण हमारे सामने नहीं है। साहित्‍यकार शिवमूर्ति ने अपने संदेश में कहा कि कामरेड शालिनी का निधन संघर्षशील आम जन के लिए एक अपूरणीय क्षति है। एक लम्बे समय से मैं उनके व्यक्तित्व के विभिन्न कोणों से परिचित था। उनकी मृत्यु पूर्व लिखी गयी लम्बी कविता ‘मेरी आखिरी इच्छा’ पढ़ने से उनके निडर और क्रान्तिकारी विचारों और दृढ़ इच्छाशक्ति का पता चलता है।

पी.यू.सी.एल. की कविता श्रीवास्तव ने शालिनी, उनके कार्यों, उनके लेखन, उनके विचार और उनके साहस को क्रान्तिकारी सलाम करते हुए कहा कि शालिनी का ब्‍लॉग मेरे जीवन में हुई कुछ सबसे अच्छी बातों में से एक है। वरिष्‍ठ लेखक-पत्रकार अजय सिंह ने कहा कि मेरे लिए शालिनी और लखनऊ में हज़रतगंज के गलियारे जनचेतना पुस्तक स्‍टॉल जैसे एक-दूसरे के पर्याय बन गये थे। शालिनी हमेशा हल्की व दोस्ताना मुस्कान से स्वागत करतीं, और नयी-पुरानी किताबों व पत्रिकाओं के बारे में बताती थीं। स्टूल पर सीधी, तनी हुई बैठी शालिनी की मुद्रा मेरे ज़ेहन में अंकित है। प्रगतिशील वसुधा के सम्‍पादक राजेन्‍द्र शर्मा ने अपने सन्‍देश में कहा कि कामरेड शालिनी ने एक साथ कई मोर्चों पर जूझते हुए जनसंघर्ष की एक व्यापक परिभाषा गढ़ी थी। उन जैसी ईमानदार साथी का इतना आकस्मिक निधन स्तब्धकारी दुर्घटना है। हमारी कतारों से एक उज्ज्वल ध्रुवतारा अस्त हो गया।

कवि नरेश सक्सेना, मलय, विजेन्‍द्र, नरेश चन्द्रकर, कपिलेश भोज, लेखक सुभाष गाताड़े, डा. आनन्द तेलतुम्बडे, चन्‍द्रेश्‍वर, वीरेन्‍द्र यादव, मदनमोहन, भगवानस्‍वरूप कटियार, प्रताप दीक्षित, शालिनी माथुर, शकील सिद्दीकी, गिरीशचन्‍द्र श्रीवास्‍तव, अजित पुष्‍कल, फिल्‍मकार फ़ैज़ा अहमद ख़ान, उद्भावना के सम्‍पादक अजेय कुमार, बया के सम्‍पादक गौरीनाथ, सबलोग के सम्‍पादक किशन कालजयी, समयान्‍तर के सम्‍पादक पंकज बिष्‍ट, जनपथ के सम्‍पादक ओमप्रकाश मिश्र, प्रो. चमनलाल, पत्रकार जावेद नकवी, दिव्‍या आर्य, डा. सदानन्‍द शाही, शम्‍सुल इस्‍लाम, मुम्‍बई के हर्ष ठाकौर, लोकायत, पुणे के नीरज जैन, सीसीआई की ओर से पार्थ सरकार, जन संस्‍कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्‍ण, जलेस के प्रमोद कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता अशोक चौधरी, वी.आर. रमण, डा. मीना काला, मोहिनी मांगलिक, हरगोपाल सिंह, नाट्यकर्मी  राजेश, डा.  साधना  गुप्‍ता सहित अनेक व्‍यक्तियों ने का. शालिनी के लिए अपने शोक-संदेशों में कहा कि उन्होंने तमाम कठिनाइयों से लड़ते हुए जिस तरह जीने की जद्दोजहद जारी रखी वह सभी नौजवानों और खासकर उन स्त्रियों के लिए एक मूल्यवान शिक्षा है जो इस देश को बेड़ियों से आज़ाद कराने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। क्रान्तिकारी आन्दोलन की दशा को ध्यान में रखते हुए, उनकी कमी को पूरा करना आसान नहीं होगा।

इस अवसर पर शालिनी के अन्तिम अवशेषों  की मिट्टी पर उनकी स्मृति में  एक पौधा लगाया गया।

सधन्यवाद,

(रामबाबू)

कृते, जनचेतना तथा अनुराग ट्रस्‍ट

(सत्‍यम)

कृते, राहुल फाउण्‍डेशन

फोनः 0522-2786782 / 8853093555 / 8960022288 / 9910462009

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#India- Statue of rape accused adorns this Chhattisgarh village #Vaw #WTFnews


SUVOJIT BAGCHI, The Hindu

A statue of former Salwa Judum member-turned-constable Kartam Surya, an accused in several cases of murder, rape and arson, was installed in Dornapal, Chhattisgarh, recently. Photo: Suvojit Bagchi

A statue of former Salwa Judum member-turned-constable Kartam Surya, an accused in several cases of murder, rape and arson, was installed in Dornapal, Chhattisgarh, recently. Photo: Suvojit Bagchi

At the peak of his career, Surya was accused of several cases of murder, rape and arson, though no formal complaint was lodged. He was made an accused, legally, by one of the women of Shamsetti who now has withdrawn her statement. The villagers claim that he used to visit Shamsetti often, carrying firearms, and threaten the residents quite openly.

A short but sturdy woman, wearing a golden nose ring and a white scarf came out of her mud house and looked straight at this correspondent. “Why have you come here,” she asked in a tone that was anything but polite. “To figure out why rape victims are retracting their statements in court,” we, a reporter from the local press and this correspondent, explained.

She was also told that there are reasons to believe that her name is Mira (name changed) — one of the six women who have retracted their allegation of rape against the Sukma SPOs.

“I have changed my statement,” she nodded in agreement. Asked why she did so, the woman said in almost flawless Hindi that “nothing ever happened” to her. “Because, I am not Mira, I am Madbi [name changed] and I do not know anything about Mira,” the woman said while moving away from us. But her recent statement identifies her as Mira alias Madbi and moreover, the 2009 statement in Konta court has her photograph on it, which establishes her identity, she was told. “How many more times will you people come to ask the same questions! Go away,” her voice choked as she disappeared into the room.

Her husband, Lakshman Soni (name changed) and the father in-law remained unmoved. A middle- aged man, who identified himself as the uncle of Mr. Soni, tried to calm things down. “It was a 2006 case; we had no plans to revive it. The human rights activists asked us to record our statements. Once the statements were recorded in 2009, everyone disappeared leaving us to deal [with the SPOs],” said a relative of the family.

The father of Era, another rape victim, also acknowledged that his wife and daughter went to the court to retract statements.

The villagers, however, did not deny that the entire village and the victims in particular were under ‘severe pressure’ for registering statements against the SPOs. The village next to Shamsetti, Misma, belongs to Kartam Surya — the most dreaded SPO-turned-constable of the area — who was killed in early 2012. At the peak of his career, Surya was allegedly involved in murder, rape and arson, though no formal complaint was lodged. He was made an accused, legally, by one of the women of Shamsetti who now has withdrawn her statement. The villagers claim that he used to visit Shamsetti often, carrying firearms, and threaten the residents quite openly. “He convinced the girls to withdraw their statements but he got killed,” said a villager who helped the women file the complaints.

His task has been taken up by Kwashi Mangalram, the former SPO who is now with the education department. Mangalram, himself an accused in the Shamsetti rape case, lives in another village adjacent to Shamsetti and ‘takes a stroll every now and then’ in the neighbourhood. Mira told The Hindu that she was ‘picked up from Shamsetti’ by Kwasi Mangalram to testify in court and retract her allegation. Other villagers corroborated her and said that he took the witnesses to court. Mangalram denied the allegation.

However, what Mangalram did not deny was his access to senior police officials in the district. Recently, to mark Kartam Surya’s death anniversary, Surya’s statue was installed in the town of Dornapal in the presence of Sukma’s SP Abhishek Shandilya. Video footage available with The Hindu establishes Mr. Shandilya’s presence at the installation programme, with Mangalram standing next to him.

Undisputed leader, says Sukma SP

Mr. Shandilya told The Hindu on phone that he felt there was “nothing wrong” in installing the statue in Dornapal. “He was the undisputed leader of the area and do not forget that anybody can be made an accused and slapped with false cases. However, the statue was financed by Surya’s family, but I was present at the programme,” he said.

He also said that Shamsetti women’s allegations are ‘false and motivated.’ “Four months back, I held a meeting in Misma, where people from other villages participated. They told me in clear terms that the allegations are false. It seems so to me as well.” Mr. Shandilya denied that the former SPOs were ‘pressurising’ the Shamsetti women to retract their statements.

“At the peak of the [Salwa Judum] movement if they [women] could go to court and file complaints [against SPOs], what stops them from fighting the case now, when there is complete calm in the area,” he asks. According to Mr. Shandilya, the women were “telling the truth now” by retracting their statements.

 

Outrage over the culture of rape in #India #Vaw #delhigangrape


 

 

By Priyanka Borpujari

|  JANUARY 06, 2013

 Demonstrators attempt to stop a police car during a protest calling for better safety for women in NewDelhi on Dec. 23. Several thousand students attended the protest, where they were met with water cannons and tear gas by the police.

GETTY IMAGES

Demonstrators attempt to stop a police car during a protest calling for better safety for women in NewDelhi on Dec. 23. Several thousand students attended the protest, where they were met with water cannons and tear gas by the police.

IN 2011, 24,206 rape cases were reported in India. That’s 66 per day — excluding the many rapes that go unreported for reasons that are as abusive as rape itself. A Thomson Reuters Foundation global poll revealed that India is the fourth-most dangerous place in the world for women. Even in the financial hub of Mumbai or the national capital New Delhi, young girls reaching puberty are advised not to look into the eyes of male passersby. More and more working women keep pepper spray with them at all times, and some keep hairpins. This happens even though the outgoing president of India is a 78-year-old woman; three Indian states have women as heads.

Yet if a rape victim is said to have “asked” for it, her family is doomed. Rapists are rarely arrested; far too often, the rape is never proven, and everything is forgotten.

Nonetheless, the recent gang rape and subsequent death of a 23-year-old woman in the nation’s capital has made headlines around the world. Thousands gathered in various cities in India to condemn the incident; two separate candlelight vigils took place in Boston and Cambridge last weekend, and several more were held across United States. The placards and the plethora of commentaries from across India have named the deceased victim “Damini” (‘‘lightning” in Hindi), or “Nirbhaya” (“fearless one”).

Why did this particular incident gather public attention? Was it because the woman and her male friend — who was also stripped and beaten — were gravely injured? Was it because it took place in the capital city? Whatever the reason, it marks a major change from the denial that usually follows such incidents.

Women in the innards of the country face oppression at every stage of their life — that is, if the female fetus is not killed in the womb. Women in cities face harassment at the workplace, on the transport system, on streets. Upon going to the police station to register complaints, they are often given a lecture on forgive-and-forget. Female cops face sexual assault themselves from their colleagues.

Yet, this momentum created over the last two weeks is crucial because it gives out a single message: “Enough.” Consider the bare facts of the case: The woman was a physiotherapy intern whose father had sold off his agricultural land to educate her. She had gone to watch a movie in Saket that evening with her male friend. Saket is a plush area of New Delhi with several malls with several international brands. This is the face of “emerging” India — a face that tries too hard to look Western, even as women fight it out from their humble upbringings to chart out a career and an identity. It is the story that resonates with almost every Indian woman who has faced molestation at least once in her life, either by a close acquaintance or a stranger.

Would there have been an expression of outrage if the victim had been a cleaning woman? The same week of this incident, there were four other rapes from different parts of the country that were reported on the news. Could it be that the Delhi incident generated so much noise because the alleged perpetrators held petty jobs as driver, fruit seller, and gym instructor?

There was no acrid call for the death penalty or chemical castration — some of the outrageous demands of angry protesters over the last two weeks — when a woman named Manorama Devi was raped in custody by army soldiers, and later murdered, in the northeastern state of Manipur in 2004. There was no immediate remedial response from the government even after 40 women from Manipur stripped naked and shouted “Indian army rape us” before the army headquarters, after the Manorama incident. Another woman named Aruna Shanbaug has been lying in a vegetative state in a hospital in Mumbai for the last 40 years, after her rapist — a ward boy in the same hospital where she was a nurse — tried to asphyxiate her by tying a dog’s chain around her neck. The rapist is free today after serving seven years in prison. Meanwhile, several leading politicians have been accused of sexual assaults.

Clearly, the issues that lead to an outcry are selective. Yet, it would be wrong to dismiss this current wave of protest, which drove people out of their homes with candles and placards in their hands, ready to face the water cannons of a combative police. These protests have managed to force the government to set up a committee to reform rape laws. But there again, the myopia of the government is obvious: It has offered just one e-mail address and a phone number for suggestions. Large parts of India still have no electricity in their homes, let alone access to a computer or Internet. And these are also the places where rapes go on, unreported, and forgotten just as easily as they take place.

 

Usha Uthup , Legendary Rockstar took the Mumbai #TimesLitCarn by Storm !!


usha
 
Dec9, 2012, Mumbai
 
 It was a longgg wait , Waiting for 45 minutes outside the door of the hall, of people screaming, the time headlines will be ‘ Usha Uthup Live, and the audience dead”, everyone laughing,  peopel tired of waiting. Then doing some time pass withs ecurity guards, to open teh door , and atleats allow some ac hawa outside ;-). As teh door opened a little bit, I shouted –”someone fainted , here opene the door ,  this hulchal going on as  Usha Uthup  did her technical sound check  in side the hall. The serpentine queue just  grew by every second, jostling each other and asking volunteers how much more time ? how much more time ?.
Bachi Karkaria came and security guard said, Madam, sorry you cant go “. arey she is the event organiser, and she very sweetly said, they dont know me , and she went in, as we put a tsamp of authority, that she should eb allowed as she is event organizer, hahahahaha
 Bachi Karkaria came out, we all screamed how much more time ,   ten minutes  she said and we all started chanting the  ten minutes , our patience running out…. bhaag hi gayi…… and ….
Finally, door opened I ran to take the best place right in front, as I had to take a few videos and see and hear her clear as crystal.
The legendary  Rock star can just touch heart of eight year old and an eighty year old as well. The teenagers swinging to her tunes, whistling, at her sense of humor.No oen just no One can perform om stage as HER , a live wire ,
Usha Uthup remembering, R D Burman she said, she was potted by by him in 1969 at gazebo and at that time she did not know , who R D Burman, later they became great friends. R D Burman wrote a song her exclusively,buts sadly she could nto sing the song, for various reasons, but was penned for her.
The song was.. ‘ Duniya main logon ko…………….. monica oh my darling…. in the begining of song there is yoddleling.. two types. Usha she  called out to me from stage to yoodle with her, that was a golden moment freezed the audience were  divdied into right and left and she gave us two types of yoddling for her songs..
As  I  I am  a big mouth, with a karari avaaz, needless to say I  was and still am  loudest in my group and Usha Uthup said from stage. Hey you in red, come up… and yoddle , and  I was like what ? who me ?/ yes you ??? and there iI went jumping up da stage ;-). Another girl from other side was called too .
One was low paparaapapa/…..one was high…parrappara…. cam  ein my lap, and I think i did do justice for my group, and got the shabashi FROM  her, when she said in her signature style ‘ super amma “, and then started all masti magic of usha Uthup.
 The Gregarious performer Usha Uthup  rcoked the mehboob studios  with her powerful singing .She also shared many anecdotes, saying, “I’m probably the only one here today who has recorded songs at Mehboob Studios.”
 Did you know that Usha Uthup wears Sports shoes with kanjeevaram embroidery ?
She  REVEALED THAT  she wears sports shoes with embroidered kanjeevaram motifs on them! She said she has cut borders from some of her saris and stuck them on her shoes so that they all add to her appearance!, ‘ ISNT THAT KOOL” ahaan .. sure it is ;-)
Regarding her jewellery she shouted’ . ‘ How do you like my gold jewellery” we all shouted love it, and she said , I have given it to Bappi Lahiri and just have gold inside, my heart ;-)
 Rearading her trademark  S aree,  she shared that many people earlier thought that it was my  publicity stunt a marketing strategy, and Sshe said  , ‘ I  was born in a middle class family where all women wore sarees, clap clap went the sudience, and hey do you see how i I show my pallu ??? , she said getting pallu ahead in style , which covered her each inch of body  and she said , ‘ Obviously , I dont want cameraman to catch my belly  tyres…. hahahahahah went on the crowd .
The night went on with jokes, music and dance , unforgettable and golden moment etched with a tinge of .. kaash it never ended
We all danced to darling………………….. and bom bombay bombay meri hai !!!
Just wished night would never end,
and  Usha Uthup would not stop singing
and
I would not stop dancing…………
Below are some videos

 

#India- Communal Harmony Awareness Kit


pic – courtesy yogesh baweja 

Dear Friends,

We are living in times where the communal biases are becoming stronger. These biases are founded upon misconception of history, and present politics. The politics which has its origin in the attempt to gain hegemony at economic, social and political level is presented under the garb of religion. The global politics for control over oil resources has also been presented in the cloak of religion.

The misconceptions about ‘other’, which form the basis of communal violence, also approve the theories of ‘clash of civilizations’ or ‘war against terror’. These need to be countered at the level of thought and ideas. The correct and positive perceptions of society have to be promoted far and wide. The awareness about truth behind the communal politics and terrorist politics needs to be taken to broad layers of our society.

Some of us have been striving to do this from last several years. There is a need that more of us, activists, teachers and concerned individuals have to join hands to strengthen this work. To help promote this crucial work we have brought “Communal Harmony Awareness Kit. This kit, after due understanding of its contents, can be used at social level for this work.

This Kit has, in sequence of use during the day, the following material

Contents of the Kit

1.      Film Ekta Sandesh ( by Waqar Khan)

This film is based on the clippings of Hindi films, which give the message of harmony: Duration 50 minutes.

2, A card, Solar message, for communal harmony: Through the experiment of letting sun light pass through symbols of different religions, it shows the oneness of humanity.

3.  Flip Chart: Sadbhavna Safar-A total presentation of major theme with the help of visuals

This flip chart is based on the book ‘Communalism: What’s False: What’s True’ and covers the themes: Communal violence, temple destructions, Syncretic culture, Battle between kings, Values of freedom movement, Kashmir imbroglio, politics behind terrorism.

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4.      Lecture DVD: Raah Aman ki: Nine DVD lectures: Each Lecture is of the duration of 25-30 minutes. Comunalism, Myths about minorities, Conversions, Politics of terror, Values of Freedom movement, Partition tragedy and Kashmir Imbroglio, Communal Organization’s Agenda (Couple of these lectures to be shown and discussed)

Using the kit

The presenter shows the film EKTA Sandesh followed by discussion. Then through the flip chart the myths and other themes are presented sequentially. Whatever questions come up during the flip chart presentation are deepened by showing Video Lectures from Raah Aman Ki. The group discussion and display of the pocket books Aman katha, Gandhi Katha and Ambedkar Katha follows the discussion.

Many of the components of the kit were released earlier. This is the attempt to put them together in a sequence.

The Kit is bilingual (Hindi+ English), please mention which language you will like to have.

Contribution: Rs 500+ Courier Rs 100

Availability

EKTA

c/o Ram Puniyani

1102/5 MHADA Deluxe Rambaug Powai Mumbai 400076

Email: ram.puniyani@gmail.com

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60th Anniversary of Ameen Sayani’s -Binaca Geet Mala #Nostalgia


header

 

Today is the 60th anniversary of the day  Geet Mala was first broadcast on Dec 3, 1952, Ameen Sayani. Sayani ran the programme to record-smashing success for nearly 45 years, earning a place among the world’s top broadcasters.

The show was first called “BINACA GEETMALA”, then “CIBACA GEETMALA” and, thereafter, “COLGATE-CIBACA GEETMALA”. It commenced over the Commercial Hindi Service of RADIO CEYLON towards the end of 1952 and shifted to All-India Radio’s VIVIDH BHARATI network in 1989.

The initial half-hour “Geetmala” began as an experimental weekly jackpot show based on a random selection of songs. It dropped into Ameen’s lap only because other leading broadcasters declined it. For all of Rs. 25 a week, he was required to select the songs, produce, script and compere the programme, and also process the mail.

The mail-response competition required every letter to be checked, and hardly 40-50 letters were expected. The first episode brought 9,000 !Within a year, that number touched 60,000 per week. The show, and the station, both began ruling the Asian airwaves – but Ameen was fast becoming a nervous wreck managing the mail response with a mini-group of volunteers! Fortunately, the competition was shelved in 1954, and was replaced by a 1-hour countdown hit-parade.

The new format became a rage in no time, drawing an estimated nine to twelve crore (90 to 120 million) listeners from all over Asia, and even from East Africa, with its powerful Short Wave sweep. “That was the golden period of film music”, Ameen reminisces. “The songs were not only fabulous, but also helped in integrating our huge, intricately multi-lingual nation. Everyone loved Hindi film songs, and everyone was latched onto Geetmala and Radio Ceylon – particularly because the gigantic network of All-India Radio had suddenly decided to totally ban Hindi film music in the early fifties!”

 

 

‘Can 17 lives be paid for with free rice?’


Kamla Kaka
Kamla Kaka, 25, Tribal Activist

Why were you angry with the CRPF?
At night on 28 June, we were attending a seed festival in our village when CRPF personnel surrounded us and started firing. Many of us lay down on the ground. Those who stood with their arms raised, shouting, “We are not Naxalites, we are villagers,” were killed. In all 17 were killed, including a 12-year-old girl. Then they set our village on fire. So when the CRPF returned later to distribute rice, I could not hold back my anger.

But they had come to distribute food.
Tell me, does the government distribute food to Naxalites? If we are Naxalites, why do they come to distribute relief materials? The rice may last us a few days, but will that really change our lives? Can 17 lives be paid for with this rice?

What do you plan to do?
I met the district collector, and then Chief Minister Raman Singh. I invited the CM to visit our village. However, he said that he will be unable to do it as long as the investigation is on. When I asked him to take some action and move the CRPF out of our village, he left without responding.

Atul Chaurasia is Chief of Bureau, Tehelka Hindi.
atul@tehelka.com

 

 

WHIPLASH: 2 paise as the worth of one’s privacy


By SUSHMA PRASAD

PUBLISHED: 20:28 GMT, 1 November 2012 | UPDATED: 21:56 GMT, 1 November 2012

Union Minister Kapil Sibal leaves after attending a meeting Union Minister Kapil Sibal leaves after attending a meeting

Two paise may not have any significance for the financial institutions guiding our economy, but it wields tremendous influence on the lives of ordinary citizens.

Two paise is the price at which a human being goes on auction in the information market.

From your name and age to gender, profession, salary and of course mobile number nearly everything can be bought for 2 paise from a phone number broker.

Incidentally, 2 paise is also what Hindi speakers use to take a reality check on life.

Haven’t you heard of the phrase do paise ki aukaat (stature worth 2 paise)? Crude as it may sound, the phrase holds a literal meaning in the virtual world.

The ease with which brokers put up our personal information – bank account, car details, loan amount etc – on sale for companies, makes it clear that the privacy we so vehemently protect is nothing but a sham.

And no matter how much we fool ourselves with the security claims of the government, we are exposed to threats of all kind for a price of 2 paise.

Talking of Hindi phrases, consider do paise ki akal nahin hai (mind not even worth 2 paise).

It perhaps explains the authorities’ ineptitude in dealing with phone brokers and bulk SMS providers.

The government will do well to apply do paise ki akal and use the database of the brokers for its various population registration programmes such as census, UID and NPR.

The brokers seem to have more accurate data than government agencies. As for our harried telecom minister Kapil Sibal, here’s some muft ki rai (free advice): Please don’t waste your time reporting pesky SMS texts to TRAI‘s ‘do not disturb’ facility.

An SMS forwarded to 1909 will only start a new series of texts – No keyword found. The pesky messages are any day more interesting than such replies.

 

Read more: http://www.dailymail.co.uk/indiahome/indianews/article-2226448/2-paise-worth-ones-privacy.html#ixzz2B6jWtpTC